– By Bhola Nath
‘हिन्दुस्तान’ के पूर्व राजनीतिक संपादक
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खास खबर : पहली कड़ी…
पटना : यह एक बड़ा स्कैम है…जो बिहार के अधिकांश मेडिकल कालेजों में चल रहा है…! मेडिकल शिक्षकों की अनिवार्य संख्या पूरी किए बिना ही इन कालेजों में चिकित्सा शिक्षा की पढ़ाई हो रही है। इस फर्जीवाड़ा की खामियाजा राज्य के लाखों मरीजों और एमबीबीएस के हजारों छात्रों को भुगतना पड़ रहा है…!!! यहां गौरतलब है कि यह गड़बड़ी ज्यादातर निजी और नए मेडिकल कालेजों में चल रही है…! ऐसे चिकित्सा महाविद्यालयों का प्रबंधन इस गड़बड़ी को सरअंजाम देने में न सिर्फ राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन और हेल्थ यूनिवर्सिटी, बल्कि नेशनल मेडिकल कौंसिल (एनएमसी) की आंखों में भी धूल झोंक रहा है…!! राज्य सरकार और एनएमसी यदि तत्परता दिखाए और बारीकी से जांच करे तो इस स्कैम का भंडाफोड़ आसानी से हो सकता है…! लेकिन, यक्षप्रश्न…क्या ऐसा वाकई होगा…!!

क्या है एनएमसी का छात्र-शिक्षक मानक ….
एनएमसी के मानक के तहत किसी भी मेडिकल कालेज में एमबीबीएस छात्रों के लिहाज से शिक्षकों की एक तय संख्या होती है। इसका पालन सभी कालेज को अनिवार्य रूप से करना होता है। नियमानुसार, 100 सीटों (छात्रों) की क्षमता वाले एनएमसी एप्रूव्ड किसी शिक्षण संस्थान में लगभग 200 से 250 मेडिकल शिक्षकों की जरूरत निर्धारित है। इनमें प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और सहायक शिक्षक मिलाकर 109, सीनियर रेजिडेंट 58, जूनियर रेजिडेंट 50 और ट्यूटर 32 होने चाहिए। इसी हिसाब से अन्य चिकित्सक, नर्सिंग और पारामेडिकल स्टाफ की दरकार है…! यही नहीं, पढाई में इस्तेमाल होने वाले अन्य जरूरी उपकरण, सीटी स्कैन, एमआरआई व एक्सरे आदि मशीनें, कई तरह के आपरेशन थिएटर, लेक्चर थिएटर आदि भी चाहिए…!! मगर, हकीकत यह है कि अधिकांश निजी मेडिकल कालेज बिना इन अर्हताओं खासकर शिक्षकों/फेकल्टी के पूरा किए ही चल रहे हैं। यह भी गौरतलब है कि किसी मेडिकल कालेज को मान्यता देने से पूर्व पहले राज्य सरकार का स्वास्थ्य विभाग, फिर हेल्थ यूनिवर्सिटी (बिहार यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज) और आखिर में एनएमसी की टीम पूरी व्यवस्था की गहन छानबीन करती है। तब कहीं जाकर उस मेडिकल कालेज को मान्यता दी जाती है। इसके बाद ही उस कालेज में मेडिकल छात्रों को पढ़ाने की अनुमति दी जाती है।
बिहार के सरकारी और निजी मेडिकल कालेज व एमबीबीएस छात्रों का नामांकन …
बिहार में एम्स, पटना और ईएसआई, बिहटा समेत कुल 13 सरकारी और 18 निजी मेडिकल कालेज हैं। इनमें निजी क्षेत्र के कुछ संस्थान तो बिल्कुल नए हैं। इनमें चार-पांच को तो हाल ही में एमबीबीएस छात्रों के नामांकन की मंजूरी मिली है। लगभग डेढ़ माह पहले ही गत 13 जुलाई को कालेजवार जारी एनएमसी की नई सूची के अनुसार बिहार में लगभग 4500 एमबीबीएस छात्रों के नामांकन की इजाजत दी गई है। किस मेडिकल कालेज में कितने छात्रों के नामांकन की मंजूरी मिली है…? और निजी कालेजों (नए – पुराने को मिलाकर) में क्या है प्रति छात्र फी स्ट्रक्चर… इसकी विस्तृत जानकारी हम इस खबर की अगली कड़ी में जानेंगे…!!
पहले ‘घोस्ट फेकल्टी’ के जुगाड़ तंत्र से चलते थे मेडिकल कालेज…
एक समय था, जब सरकारी कालेजों में मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) का दौरा होता था (अभी एमसीआई को ही हम एनएमसी के नाम से जानते हैं)…तो टीम का जिस किसी सरकारी मेडिकल कालेज का इंस्पेक्शन करने जाना होता था, उस कालेज में शिक्षक/फेकल्टी की कमी दूर करने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा अन्य चिकित्सा कालेजों से पर्याप्त संख्या में शिक्षकों/फेकल्टी को वहां डेप्यूटेशन पर भेज दिया जाता था। दो-तीन दिन में एनएमसी का निरीक्षण खत्म होते ही प्रतिनियुक्त खत्म और फेकल्टी अपने – अपने मूल कालेजों में लौट जाते थे। इसका गवाह दो मेडिकल कालेजों में ‘इस खबर का लेखक’ खुद भी रहा है। वहीं, निजी मेडिकल कालेजों में इसके लिए अलग तरह की सेटिंग होती थी। इसके लिए कुछ खास ‘लोग’ होते थे, जिनको हालात को संभालने के लिए एक्टिव किया जाता था। वे अपने संपर्क के कई चिकित्सकों को ‘मैनेज’ करते थे। इनमें कई तो प्रमुख चिकित्सक भी होते थे। ये सभी इंस्पेक्शन वाले कालेज में जाकर शिक्षक/फेकल्टी की कमी दूर कर देते थे। संकट में काम आने के बदले में इन डाक्टरों की ‘अथक’ मेहनत की ‘भरपाई’ भी की जाती थी। तब चिकित्सा शिक्षा के हलके में इन खास शिक्षकों को ‘घोस्ट फेकल्टी’ कहा जाता था।
एनएमसी ने बदल दी पूरी व्यवस्था, फिर भी लग गई सेंध…
लेकिन, आखिर यह ‘खुला सत्य’ कब तक छिपता…! पुराने डाक्टरों को इस ‘जुगाड़ तंत्र’ की पूरी जानकारी है। इस बाबत एमसीआई से जुड़े एक वरिष्ठ चिकित्सक के विचार भी हम आगे जानेंगे। यह ओपन ट्रूथ (खुला सत्य) है कि अधिकांश निजी मेडिकल कालेजों में शिक्षक /फेकल्टी बहुत कम होते हैं। आम दिनों में इसी ‘लो स्ट्रेंथ’ से काम चलाया जाता है। …और उस दौर में जैसे ही एमसीआई (अभी एनएमसी) के निरीक्षण की भनक लगती थी, बड़ी संख्या में ‘घोस्ट फेकल्टी’ आनन फानन में उतार दिए जाते थे। धीरे-धीरे एनएमसी को भी ‘घोस्ट फेकल्टी’ नाम के इस ‘मैनेजमेंट’ का पता चल गया। इसके बाद एनएमसी ने अब किसी मेडिकल कालेज में शिक्षकों /फेकल्टी की उपस्थिति की पूरी व्यवस्था ही बदल दी है। लेकिन, इसमें भी सेंध लग ही गई। आखिर क्या है, एनएमसी की नई अटेंडेंस व्यवस्था और कैसे लगी उसमें सेंध…जानेंगे, हम इस खास खबर की अगली कड़ी में…!!!