– By Bhola Nath
‘हिन्दुस्तान’ के पूर्व राजनीतिक संपादक
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खास खबर : दूसरी कड़ी…
पटना : ये नामचीन प्रोफेसर साहब हैं …! महानुभाव किसी निजी मेडिकल कालेज में प्रिंसिपल भी हैं । नियमानुसार, उनको उस कालेज में सुबह 9 से 5 बजे तक मौजूद रहना है। मगर, ये जनाब पटना या बिहार के अपने किसी पसंदीदा शहर में इस वक्त प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे हैं और उसी समय 100-200 किमी दूर सूबे के किसी मेडिकल कालेज में उनकी हाजिरी भी बन रही है…! सूबे के अधिकतर मेडिकल कालेजों में वहां के कई फेकल्टी / शिक्षक इस कारनामे को अंजाम दे रहे हैं…!! आखिर कैसे…? महाप्रभु, यह क्या लीला है…! आखिर, बिना किसी दिव्यशक्ति के बूते कोई शख्स एक ही समय में दो जगहों पर उपस्थित रहने का चमत्कार कैसे कर सकता है…? वह भी तब, जबकि उनके बीच खासी दूरी हो…! एनएमसी के नए सिस्टम के तहत यह बैन है…! ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि इस फर्जीवाड़े पर रोक के लिए क्या है एनएमसी का नया हाजिरी सिस्टम और कैसे लगाई जा रही है उसमें सेंध…!! बिहार के ज्यादातर प्राइवेट मेडिकल कालेजों में धड़ल्ले से चल रहे इस मायाजाल या कहें गोरखधंधा के बारे में हम जानेंगे, BRBJ News की इस खास खबर के पार्ट – 2 में…!!!

शिकायतों के बाद एनएमसी ने बदल दी पूरी व्यवस्था…
इस खास खबर की पहली कड़ी में हमने विस्तार से ‘घोस्ट फेकल्टी’ के बारे में जाना कि किस तरह एक समय मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया यानी एमसीआई (अब नेशनल मेडिकल कौंसिल यानी एनएमसी) के इंस्पेक्शन के समय निजी मेडिकल कालेजों में ‘जुगाड़ तंत्र’ सक्रिय हो जाता था। कुछ खास तरह के ‘लोगों’ को चिकित्सकों को फौरी तौर पर ‘मैनेज’ करने के काम में लगाया जाता था। उनके संपर्क वाले ये सभी चिकित्सक इंस्पेक्शन वाले मेडिकल कालेज में जाकर शिक्षक/फेकल्टी की कमी दूर कर देते थे। एनएमसी की टीम संतुष्ट होकर लौट जाती थी। इसके बाद संकटमोचक इन चिकित्सकों का ‘खास ख्याल’ रखा जाता था…! उस समय चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र में इन खास तरह के शिक्षकों को ‘घोस्ट फेकल्टी’ कहा जाता था।

बिहार से उत्तराखंड, गुजरात, दिल्ली, पंजाब जाते थे ‘घोस्ट फेकल्टी’…
लगभग डेढ़ दशक तक एमसीआई का चेयरमैन रहे डा. अजय कुमार ने डेढ़ –दो माह पहले एक इंटरव्यू में ‘घोस्ट फेकल्टी’ के तथ्य को स्वीकार किया था, इसे सच बताया था। उन्होंने बताया कि किस तरह पटना एयरपोर्ट पर 20-20 25-25 डाक्टरों का झुंड टकरा जाता था और पूछने पर वे सभी बताते थे कि आप तो सब जानते ही हैं। डा. कुमार के मुताबिक डाक्टरों का ऐसे समूहों में बड़े नाम वाले चिकित्सक भी होते थे, जो उत्तराखंड, गुजरात, दिल्ली, पंजाब, आदि राज्यों में ‘घोस्ट फेकल्टी’ बनकर वहां के मेडिकल कालेजों में शिक्षकों की कमी दूर करने जाते थे। डा. कुमार का कहना है कि इसे एजेंट या दलाल मैनेज करते थे और बदले में उन चिकित्सकों को ‘बेहतरीन विदाई’ दी जाती थी। इस गोरखधंधे को लेकर एनएमसी को कई बार और कई तरह की शिकायतें हुईं। धीरे-धीरे केन्द्र सरकार / एनएमसी को भी हकीकत का पता चला तो उसने इसे गंभीरता से लेते हुए अटेंडेंस की इस पूरी व्यवस्था ही बदल दी…!
‘घोस्ट फेकल्टी’ की शिकायतों से निपटने के लिए की गई नई व्यवस्था…
‘घोस्ट फेकल्टी’ की शिकायतों से निपटने के लिए एनएमसी ने नई व्यवस्था की। इस व्यवस्था में अटेंडेंस के लिए चेहरे की पहचान का प्रावधान किया गया। यह ‘आधार’ आधारित होता था। इसे आधार बेस्ड फेशियल सिस्टम (अबास) नाम दिया गया। इस सिस्टम में चिकित्सकों की सुबह 9 से पांच बजे तक मेडिकल कालेज में उपस्थिति अनिवार्य रूप से दिखाने की व्यवस्था है। सीसीटीवी बेस्ड इस व्यवस्था में हर मेडिकल कालेज में शिक्षकों / फेकल्टी की उपस्थिति की मॉनिटरिंग एनएमसी से हर दिन निर्धारित समय में की जाती है। लेकिन, जैसा कि हमने इस खबर की पहली कड़ी में बताया कि एनएमसी के मानक के अनुसार, 100 एमबीबीएस सीटों (छात्रों) की क्षमता वाले एनएमसी एप्रूव्ड किसी शिक्षण संस्थान में लगभग 200 से 250 मेडिकल शिक्षकों की जरूरत निर्धारित है। इनमें प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और सहायक शिक्षक मिलाकर 109, सीनियर रेजिडेंट 58, जूनियर रेजिडेंट 50 और ट्यूटर 32 होने चाहिए। मगर, शिक्षकों/फेकल्टी की इतनी संख्या पूरी करना आर्थिक और अन्य कारणों से कालेज प्रबंधन के लिए काफी मुश्किल होता है। कुछ नए डाक्टर, रेजिडेंट या ट्यूटर तो रोज चले भी जाएं, मगर प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और सहायक स्तर के सीनियर शिक्षकों को इसके लिए तैयार करना टेढ़ी खीर साबित होती है।
डेली अटेंडेंस की मुश्किल की काट और सिस्टम में सेंध के लिए लाया गया यह ‘ब्रह्मास्त्र’…
…तो इस मुश्किलात से निपटने और सिस्टम में सेंध लगाने के उपाय पर जमकर मंथन चला… और काट में लाया गया ‘ब्रह्मास्त्र’…! यह ‘ब्रह्मास्त्र’ कंप्यूटर और इंटरनेट से आपरेटेड एक डिवाइस (मशीन) है। इसमें शिक्षक/ फेकल्टी के रोज कालेज आने की जरूरत नहीं है। वे कहीं भी रहें इस डिवाइस के जरिए ‘आबास’ में उनका फेशियल अटेंडेंस एनएमसी में सुबह 9 बजे से 5 बजे तक बनता रहेगा। अब आप कहेंगे कि कोई चिकित्सक जाएगा ही नहीं तो मरीजों का इलाज कौन करेगा… मेडिकल कालेज व अस्पताल चलेगा कैसे…? तो इसका उपाय यह किया गया कि शिक्षकों / फेकल्टी को अलग-अलग तरह से ऐंगेज किया गया। कुछ मेन फेकल्टी हैं, जिनको हफ्ते में तीन-या चार दिन के लिए नियमित रूप से रखा गया। यानी इनको महीने में 10-12 दिन ही जाना होता है। वहीं, कुछ रेजिडेंट / ट्यूटर को पूरे महीने के लिए एंगेज किया गया। इस तरह कुल 200 से 250 के स्ट्रेंथ के 20 से 30 फीसदी शिक्षकों/फेकल्टी को ही रोज की उपस्थिति के लिए एंगेज किया गया। बाकी को केवल ऑन रिकार्ड (डाक्यूमेंट से लहजे में कहें तो ऐज पर रिकार्ड) रखा जाता है…! वैसे तो ये गैर हाजिर रहते हैं, लेकिन, जरूरत पड़नो पर इनको आनन-फानन बुला लिया जाता है। इनको अपनी डाक्टरी के कागजात कॉलेज को सौंपने होते हैं। बदले में प्रबंधन द्वारा इनका विशेष ‘ख्याल’ रखा जाता है…!!
एनएमसी, सरकार या प्रशासन चाहे तो जांच में हो जाएगा खुलासा …
BRBJ News का मकसद सिर्फ व्यवस्था पर सवाल उठाना नहीं है, बल्कि मरीजों और छात्रों के हित में मसले का समाधान भी करना है। यदि एनएमसी, स्वास्थ्य विभाग या जिला प्रशासन इसकी गहन छानबीन कराए तो इस पूरे गोरखधंधे का खुलासा आसानी से हो सकता है। चूंकि हर कालेज में सीसीटीवी लगा होता है, प्रशासन चाहे तो कभी भी एक माह का वीडियो फुटेज मंगाकर उसके आधार पर आसानी से इसकी पड़ताल कर सकता है। इससे पता चल सकेगा कि कोई शिक्षक/फेकल्टी किसी मेडिकल कालेज में गया या नहीं और यदि गया तो कितने दिन गया…!! एनएमसी या भारत सरकार इसकी जांच सीबीआई या किसी हाईलेवल कमेटी से कराए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो सकता है…!! आखिर यह हजारों एमबीबीएस छात्रों के भविष्य का सवाल है…! सूत्रों के मुताबिक प्रबंधन द्वारा करोड़ों के इस खेल में एनएमसी और स्वास्थ्य विभाग के कुछ लोगों की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता है…!! जरूरत है तो सिर्फ निष्पक्ष जांच की…!!! क्या यह हो सकेगा…!!!
स्वास्थ्य मंत्री निशांत नर्सिंग कालेजों के साथ ही मेडिकल कालेजों पर भी ध्यान दें…
यह भी गौरतलब है कि स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार नर्सिंग कालेजों की पढ़ाई में सुधार के लिए इनका इंस्पेक्शन/जांच कराने के बारे में अक्सर बयान दे रहे हैं। यह भी कह रहे हैं कि यदि नर्सिंग कालेजों में शिक्षक नहीं हैं, तो फिर इनको मान्यता कैसे दे दिया गया। यही नजरिया उनको मेडिकल कालेजों के बारे में भी अपनाना चाहिए। यदि निशांत कुमार स्वास्थ्य विभाग को निर्देशित कर अपने तरीके से मेडिकल कालेजों की जांच कराएं तो इस गड़बड़ी का पता चल सकता है। इस तरह बिना पर्याप्त शिक्षकों / फेकल्टी के चल रहे अधिकांश मेडिकल कालेजों पर रोक लग सकती है और स्थिति में सुधार हो सकता है।
फेशियल अटेंडेंस में शिक्षक भी कर रहे थे गड़बड़ी, शिक्षा विभाग ने लगाई रोक …
मालूम हो कि कुछ इसी तरह का मामला एक समय शिक्षा विभाग में भी आया था। कई शिक्षक स्कूल आते ही नहीं थे। ऐसे में निर्धारित समय तक विद्यालय में शिक्षकों की मौजूदगी सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने एक नई व्यवस्था की। इसके तहत नियोजित शिक्षकों को हर कार्यदिवस पर स्कूल पहुंचकर फोटोयुक्त अपनी उपस्थिति ई-शिक्षा कोष के पोर्टल पर दर्ज करनी होती थी। इसके लिए उनको स्कूल जाकर चेहरे की तस्वीर के साथ हाजिरी बनानी थी। लेकिन, कई शिक्षकों ने इसका काट यह निकाला कि अपने किसी साथी शिक्षक को अपने कुछ फोटो दे देते थे और वह साथी संबंधित शिक्षक के स्कूल गए बिना ही कक्षा की दीवार पर उसकी फोटो रखकर तस्वीर ले लेते थे और उसे पोर्टल पर अपलोड कर देते थे। इसकी पुष्टि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी (आईएएस) ने भी की। उन्होंने बताया कि बाद में यह गड़बड़ी पकड़ी गई और शिक्षा विभाग ने उन शिक्षकों पर एक्शन लिया और इसे रोका गया। लेकिन, चूंकि यह बिहार सरकार की अपनी व्यवस्था थी, इसलिए रोक लग सकी। अब एनएमसी केंद्रीय एजेंसी है। …तो बिहार सरकार को अपने यहां इसे लागू कराना आसान नहीं होगा…!!