– By Bhola Nath
‘हिन्दुस्तान’ के पूर्व राजनीतिक संपादक
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खास खबर : चौथी कड़ी…
पटना : यदि आप सिर्फ MBBS क्वालिफाइड डाक्टरी के सर्टिफिकेट के आधार पर किसी से चिकित्सकीय सलाह लेने या इलाज कराने जा रहे हैं… तो सावधान हो जाइए…!! पहले इस खबर पर गौर फरमाइए…नीट पीजी – 2026 की परीक्षा में 256 MBBS डाक्टरों को जीरो यानी शून्य अंक आए हैं…वहीं, करीब आधे डॉक्टर जनरल कटऑफ भी पार नहीं कर पाए…!! यानी इन्हें एमबीबीएस की डिग्री तो है, मगर उसका वांछित तजुर्बा नहीं है…!! हम अक्सर झोलाछाप डॉक्टर, ‘Quack’ या फिर ‘नीम हकीम’ को अलग नजर से देखते हैं…ये वे हैं, जिनके पास Medical की कोई वैध डिग्री या कानूनी मान्यता नहीं होती है, फिर भी वह मरीजों का इलाज करते हैं…!! नीट पीजी परीक्षा के नतीजों के मद्देनजर देखें तो अगर किसी के पास बाकायदा मेडिकल यानी एमबीबीएस डाक्टर की वैध डिग्री भी है तो क्या उसका लाभ वाकई मरीजों को मिल पा रहा है…!!!
बिना साधन वाले निजी कालेजों से पढ़े नए डाक्टरों के भविष्य पर सवाल…
मेडिकल कालेजों, खासकर अधिकांश निजी में अभी जो पढ़ाई हो रही है, उसके आधार पर सिर्फ पांच साल में डिग्री हासिल कर लेना बड़ी बात नहीं है। संपन्न घरों के अनेक छात्र पैसे के दम पर निजी मेडिकल कालेजों में नामांकन तो पा जाते हैं, मगर, किसी मरीज के इलाज के लिए जो जानकारी चाहिए, वह हासिल नहीं कर पाते…!! …BRBJ News ने अपनी पिछली तीन कड़ियों में इस सवाल को प्रमुखता से उठाया है कि किस तरह नेशनल मेडिकल कौंसिल (एनएमसी) के नियमों का उल्लंघन कर बिहार के अधिकांश मेडिकल कालेज चलाए जा रहे हैं…! अब वहां से पढ़कर निकले अधिकतर छात्र तो ऐसे ही तजुर्बे वाले होंगे…! कई कालेजों में न ही निर्धारित संख्या में फेकल्टी/शिक्षक होते हैं और न ही नर्सेज और अन्य पारा मेडिकल स्टाफ व अन्य सुविधाएं…!! न ही इनमें उतनी संख्या में मरीज होते हैं, जिनकी चिकित्सकीय जांच/उपचार/सर्जरी कर एमबीबीएस छात्र तजुर्बा हासिल कर सकें…! ऐसे में यहां से पढ़कर निकले हजारों नए डाक्टरों का भविष्य क्या दांव पर नहीं लग रहा है…??
नीट पीजी परिणाम से देश की मेडिकल शिक्षा और डॉक्टर्स पर भी बड़ा सवाल…
नीट पीजी की परीक्षा वे एमबीबीएस क्वालिफाइड डाक्टर देते हैं, जो मेडिकल के क्षेत्र में उच्च शिक्षा या विशेषज्ञता हासिल करने के लिए पोस्ट ग्रेजुएशन यानी पीजी में नामांकन लेना चाहते हैं। जाहिर है, पीजी परीक्षा का आधार एमबीबीएस की शिक्षा ही होती है। यदि कोई छात्र एमबीबीएस की पढ़ाई ठीक से की है, तो उसे इसमें सफल होने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। लेकिन, हम साभार जिस दैनिक भास्कर की खबर का हवाला दे रहे हैं, उसका विस्तृत ब्योरा तो और चौंकाने वाला है…! इसके परिणाम से देश की मेडिकल शिक्षा व्यवस्था और डॉक्टर्स पर भी बड़े सवाल खड़े हो गए हैं…! इसके मुताबिक, नीट पीजी-2026 परीक्षा की मेरिट लिस्ट के विश्लेषण में सामने आया है कि एमबीबीएस पास देश के 256 डॉक्टर 720 में से शून्य अंक भी हासिल नहीं कर पाए और इनका कुल स्कोर माइनस तक सिमट गया। सबसे अंतिम रैंक पर रहे डॉक्टर का स्कोर माइनस 19 है…! कुल 720 अंकों के पेपर में जनरल और ईडब्ल्यूएस के लिए कटऑफ 262 अंक निर्धारित थे। लेकिन, ये अंक हासिल करने वाले डॉक्टर की रैंक 1,33,653 रही…! यानी…49.74% के अंक तय कटऑफ 262 से भी कम आए, यानी, करीब आधे डॉक्टर जनरल कटऑफ भी पार नहीं कर सके…!

बिना सही जानकारी वाले डाक्टर इलाज करेंगे तो मरीजों का क्या होगा…
अब जरा तस्वीर के दूसरे रूख पर गौर करते हैं…! चलिए, ये डाक्टर नीट पीजी क्वालिफाई नहीं कर पाए, मगर, इनके पास एमबीबीएस की डिग्री तो है ही। ये डाक्टर कहीं भी, निजी अस्पताल, नर्सि़ंग होम, मेडिकल कालेज या फिर सरकारी अस्पतालों आदि में आसानी से नौकरी पा सकते हैं। या फिर खुद की प्रैक्टिस शुरू कर सकते हैं। सरकारी अस्पतालों के लिए तो आज कल आम तौर पर बिहार सरकार का स्वास्थ्य विभाग महज वॉक-इन-इंटरव्यू के जरिए डाक्टरों का सेलेक्शन कर लेता है…! इसमें सिर्फ सर्टिफिकेट देखा जाता है। कोई रिटेन एग्जाम नहीं होता…! हम ये नहीं कह रहे हैं कि सभी नए डाक्टरों को जानकारी नहीं होती…!! लेकिन, यदि नीट पीजी के इस बार के एग्जाम में शामिल एमबीबीएस डाक्टरों के नतीजों को आधार बनाकर मंथन किया जाए तो लगभग आधे डाक्टर तो ऐसे हैं, जो जनरल कटऑफ यानी 720 में 262 अंक भी नहीं ला पाए…! बिना सही जानकारी वाले ऐसे डाक्टरों को यदि इलाज/उपचार या सर्जरी के काम में लगा दिया जाता है, तो फिर मरीजों का क्या होगा…!!
क्यों न प्रैक्टिस से पूर्व डाक्टरों के ज्ञान का इम्तहान लेने की नीति बने …

BRBJ News की इस खास खबर की शृंखला में हम बार-बार यह सवाल उठा रहे हैं कि बिना सही पढ़ाई के जहां हजारों एमबीबीएस छात्रों का जहां भविष्य खराब हो रहा है, वहीं, उनसे इलाज कराने वाले लाखों मरीजों की भी जान पर बन सकती है। अक्सर गलत इलाज के कारण मरीज को होने वाली परेशानी या जान जाने और अस्पतालों में हंगामे की खबर सुर्खियां बनती हैं। हम यह नहीं कहते कि हमेशा गलती डाक्टर या अस्पताल की ही होती है…! मगर, कई बार यह भी एक बड़ा कारण होता है…!! ऐसे में क्या प्रैक्टिस से पूर्व किसी एमबीबीएस डाक्टर के ज्ञान की जांच के लिए कोई एग्जाम की व्यवस्था या नीति नहीं बननी चाहिए…! ठीक वैसे ही जैसे, विदेशों से पढ़कर आए डाक्टरों के लिए उनके द्वारा प्रैक्टिस करने से पूर्व स्वास्थ्य मंत्रालय डिप्लोमैट ऑफ नेशनल बोर्ड (डीएनबी) द्वारा फॉरेन ग्रेजुएट इलिजिबिलिटी टेस्ट कराता है। इसे क्वालिफाई करने के बाद ही उनको मेडिकल कालेजों में इनटर्नशिप के लिए भेजा जाता है। …और तब जाकर कहीं विदेश से पढ़कर आए डाक्टरों को देश में प्रैक्टिस की अनुमति मिलती है। यहां गौरतलब है कि अब लॉ के क्षेत्र में भी सिर्फ सिर्फ लॉ की डिग्री पर्याप्त नहीं है, यदि आपको हाईकोर्ट में या किसी दूसरे राज्य में वकालत की प्रैक्टिस करनी है तो आल इंडिया बार एग्जामिनेशन (एआईबीई) का रिटेन टेस्ट भी निकालना होगा…! बात जब आमलोगों, खासकर वंचित जनता के बेहतर इलाज की हो तो डाक्टरों के लिए भी यह व्यवस्था की जानी चाहिए। कई वरिष्ठ डाक्टर इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि डाक्टर इसका विरोध करेंगे…! लेकिन, सवाल है कि क्या विरोध के डर से मरीजों की जान सांसत में डाल दिया जाए…! इस पर आपका क्या कहना है…??