– By Bhola Nath
‘हिन्दुस्तान’ के पूर्व राजनीतिक संपादक
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खास खबर : पांचवीं कड़ी…
पटना : जब आरोग्य मंदिर ही ‘खाला का घर’ बन जाए तो वहां से निकलने वाले धरती के दूसरे भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर साहब कैसे होंगे…! कुछ यही हाल बिहार के मेडिकल कॉलेजों खासकर निजी का है…! जहां अधिकतर में प्रबंधन की मनमानी चल रही है… ! नेशनल मेडिकल काउंसिल यानी एनएमसी की कसौटी पर कसें तो अधिकतर मेडिकल कॉलेजों में गुरुजी की तो भारी कमी है ही, नर्सिंग व अन्य पैरामेडिकल स्टाफ की भी घनघोर किल्लत है…! यही हाल ओटी व लैब टेक्निशियन, आदि स्टाफ और इक्विपमेंट का है…! निर्धारित संख्या और मानक के अनुरूप ओटी भी नहीं हैं…! ओपीडी में आने वाले और इंडोर में भर्ती मरीजों के नम्बर मैन्युपुलेटेड होते हैं…! कई कॉलेजों के सर्जरी, डिलीवरी, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सोनोग्राफी, एमआरआई और सीटी स्कैन के आंकड़े भी ज्यादातर फर्जी होते हैं…! एनाटॉमी विभाग में शव नहीं उपलब्ध होते, ताकि इनका डिसेक्शन कर MBBS छात्र मानव अंगों के बारे में सही ढंग से जान सकें। ऐसे संस्थान से मेडिकल की पढ़ाई कर निकले छात्र मरीजों का किस तरह या कितना इलाज कर सकेंगे, आप खुद ही सोच सकते हैं…! तुर्रा यह कि किसी लेबल पर कोई जांच की कारगर व्यवस्था भी नहीं है…!!
एनएमसी के निर्धारित मानकों को दिखाया रहा ठेंगा…
मेडिकल कॉलेजों की कंट्रोलिंग अथॉरिटी एनएमसी के निर्धारित मानकों पर गौर करें…! इसके अनुसार MBBS की 150 सीटों के लिए सरकारी या प्राइवेट हर तरह के मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी व अन्य शिक्षकों की निर्धारित संख्या 204 है। इसके अलावा जेनरल के तीन बेड के लिए एक नर्स, आईसीयू के दो बेड के लिए एक नर्स और वेंटिलेटर के एक बेड पर एक नर्स की तैनाती होनी चाहिए। इस तरह 200 से 250 से अधिक नर्स चाहिए। मगर, आप घूम आइए किसी भी कालेज में यह संख्या यदि हो…! वैसे ही तरह अलग-अलग तरह के टेक्निशियन की संख्या करीब 48-50 होनी चाहिए। एक टेक्निशियन पर औसतन 2-3 के हिसाब से उनके लिए हेल्पर, ड्रेसर व अन्य स्टाफ भी होने चाहिए। लेकिन, ये आंकड़े सिर्फ कागजों पर ही मेनटेन होते हैं। आप महीने में चार बार किसी निजी मेडिकल कालेज का विजिट कर लीजिए… हकीकत का पता चल जाएगा…!!
फेकल्टी और अन्य शिक्षकों की जरूरत के बारे में जानेंगे इस पीडीएफ तस्वीर से…

(साभार…)
MBBS सीट के लिहाज से न तो बेड, न मरीज और न ही जांच…
इसी तरह 150 एमबीबीएस सीट वाले किसी मेडिकल कालेज के ओपीडी में मरीजों की संख्या 1200 निर्धारित है। इनमें इतने ही यानी 1200 मरीज रोज अस्पताल में एनरोल होने चाहिए। वहीं, इंडोर पेशेंट डिपार्टमेंट में भर्ती मरीजों के लिए बेडों की संख्या 562 होना चाहिए। इनमें से 80 फीसदी बेड अक्यूपेंसी भी होनी चाहिए। लेकिन, अधिकतर मेडिकल कालेजों में ऐसा नहीं है। वहीं, रोज कैजुअल्टी में 80 मरीज भर्ती होने चाहिए। मेजर व माइनर ऑपरेशन 20-20 और नॉर्मल डिलिवरी व सीजेरियन सेक्शन 4-4 से अधिक होने चाहिए। इनडोर-आउटडोर मिलाकर रोज एक्स-रे 150, अल्ट्रासोनोग्राफी 88 और सीटी स्कैन 20 से अधिक होना चाहिए। साथ ही, एमआरआई की भी व्यवस्था होनी चाहिए। यह संख्या यदि कहीं हो तो दिखाएं…! यहां सवाल यह उठता है कि अगर अधिकतर निजी कालेज एनएमसी के अनिवार्य नियम – कानूनों को भी धता बताएं तो MBBS छात्र और मरीज के हित में क्या किया जाए…? जवाब यह आ रहा है कि क्यों न ऐसे मेडिकल कॉलेजों को एनएमसी द्वारा डी-रिकाग्नाइज कर दिया जाए…!
किसी मेडिकल कालेज में क्या-क्या होना जरूरी है, इस तस्वीर (टेबल) से जानते हैं…

कालेजों को तो लम्बे समय से कैडेवर भी नहीं मिले, छात्र कैसे सीखें…
कई कालेजों को तो लम्बे समय से मृत मानव शरीर (डेड ह्यूमन बॉडी) यानी कैडेवर (Cadaver) भी नहीं मिले हैं। चिकित्सा विज्ञान में इसका उपयोग विशेष रूप से मानव अंगों के बारे में पढ़ाई या चीर-फाड़ (विच्छेदन/डिसेक्शन) के लिए किया जाता है। इसके बिना एमबीबीएस के छात्र आखिर मानव शरीर की जटिल संरचना के बारे में कैसे जान सकेंगे। जानकारों के मुताबिक छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान के लिए दान किए गए या लावारिश शव या लाश के प्रतिच्छेदन के माध्यम से छात्रों को प्रैक्टिकल करके बताया जाता है। लेकिन, हो यह रहा है कि पीएमसीएच जैसे बड़े अस्पतालों को ती फिर भी कभी-कभार बॉडी मिल जाती है, अन्य कालेज तो वर्षों इंतजार करते रहते हैं।
हाल में अस्तित्व में आए मेडिकल कालेजों का हाल तो और भी खराब…
बिहार में हाल में अस्तित्व में आए मेडिकल कालेजों का हाल तो और भी खराब है। इनमें सारण प्रमंडल के भी दो हैं, जिनमें एक का नाम सरकार के पूर्व मंत्री के नाम से भी जुड़ा है। गत 13 जुलाई को एनएमसी ने इसे एमबीबीएस सीट का आवंटन नहीं किया। प्रबंधन की first अपील के बाद इस 100 सीटों की मंजूरी भी मिल गई। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यहां एमबीबीएस पढ़ाई की तो बात ही छोड़ दीजिए, प्रापर इलाज का भी टोटा है…! इसी तरह गयाजी प्रमंडल के एक जिले के कालेज के बारे में तो शिक्षकों और फेकल्टी को लेकर कई तरह की अनियमिततताओं की शिकायत भी एनएमसी में की गई। मगर, कार्रवाई तो दूर, उसे भी 50 एमबीबीएस सीट आवंटन का रिवार्ड मिल गया…!! एक कालेज के बारे में तो एनएमसी की टीम की एडवर्स इंस्पेक्शन रिपोर्ट के बावजूद उसके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया। जानकारी के मुताबिक ‘ऊपरी दबाव’ में उसे क्लीनचिट दे दिया गया। डेढ़ दशक तक मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन रहे डा. अजय कुमार ने दो माह पहले एक इंटरव्यू में बताया कि है कि देश में मेडिकल कालेजों की संख्या तो डेढ़गुनी से अधिक बढ़ गई, मगर, शिक्षक उस तादाद में नहीं बढ़े। इस कारण क्वांटिटी तो बढ़ी पर क्वालिटी नहीं बढ़ी…!!
मोहभंग…! इलाज के लिए संपन्न लोग बड़े निजी अस्पतालों या दिल्ली-मुम्बई जा रहे…
शायद यही वजह है कि बिहार के अधिकतर मेडिकल कालेजों पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है। गौर कीजिएगा…सरकारी मेडिकल कालेजों में साधन संपन्न लोगों ने इलाज कराने जाना लगभग छोड़ दिया है। यहां आम तौर पर गरीब, वंचित तबका या फिर निम्न मध्यमवर्गीय लोग ही इलाज के लिए जा रहे हैं। दूसरी ओर, राजधानी पटना के बड़े नाम वाले निजी अस्पताल और नर्सिंग होम गुलजार हो रहे हैं। वहीं, पटना से बाहर के अधिकांश मेडिकल कालेज भोले-भाले ग्रामीणों के भरोसे चल रहे हैं। गांवों के मरीजों के बहलाने-फुसलाने के खबरें अक्सर आती रहती हैं। एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने तो यहां तक कह दिया कि वे अब ब्लड जांच कराने भी स्वनामधन्य बड़े सरकारी मेडिकल कालेज-अस्पतालों में नहीं जाते हैं। उन्होंने बताया कि उनके परिवार के करीबी सदस्य को स्वास्थ्य संबंधी कुछ समस्या हुई तो वे सीधे दिल्ली इलाज कराने गए। राज्य के बड़े राजनीतिक शख्सियतों का भी यही हाल है। वे तो छोटी-मोटी बीमारियों के लिए भी दिल्ली, मुम्बई, बंगलोर या विदेश का रुख करते हैं।