भोला नाथ
आखिरकार जेन जेड के आर्गेनिक आंदोलन के दबाव में धर्मेन्द्र प्रधान को देश के शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। जिस सरकार के केन्द्रीय मंत्री पहले यह कह रहे थे कि मोदी सरकार में इस्तीफे नहीं होते। उनको मुंह की खानी पड़ी। अंततः प्रधान को त्यागपत्र देना पड़ा। आंदोलनकारियों की मुख्य मांग भी यही थी। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) इससे खासा उत्साहित है। स्वाभाविक भी है। अब तक अभेद्य समझी जाने वाली भाजपा की दीवार में उसकी अगुआई में युवाओं ने डेंट तो डाल ही दी है। इसके साथ ही, सरकार ने सीजेपी की तीनों मांगें मान ली हैं। …और पार्टी ने कॉकरोच आंदोलन वापस लेने की घोषणा कर दी है। सवाल यह है कि क्या इससे आंदोलन वाकई खत्म हो गया है…। …या भविष्य में इसकी राख से फिर कोई चिंगारी निकल सकती है?

आज की तारीख में देश के न सिर्फ युवाओं बल्कि आमलोगों में भी बेचैनी है। लोग परेशान हैं। उनकी कहीं सुनवाई नहीं हो रही है। अपनी इस बेचैनी और परेशानी का हल वह तथाकथित धार्मिक मुद्दों में नहीं तलाश कर पा रहा है। लिहाजा आंदोलन का ईपी सेन्टर (धुरी) नई दिल्ली का जंतर – मंतर कब फिर कंपित होने लगे, कहना मुहाल है। वह भी तब जबकि युवा इस तरह के आंदोलन को इंज्वाय करने लगें। इस आंदोलन ने जिस तरह के नए – नए नैरेटिव गढ़े, उससे इसने पुराने ढर्रे के आंदोलनों और नारों की इसने हवा निकाल दी। इस आंदोलन ने यह भी साफ हो गया कि युवा जब अपनी पर आते हैं तो पक्ष-विपक्ष सबको एक लाठी से हांक देते हैं। इसलिए सीजेपी भी काफी अलर्ट मोड में दिख रहा है। उसे अहसास है कि जिन युवाओं ने उसे कंधे पर बैठाया है, उन्हें जमीन पर पटकते भी इसे देर नहीं लगेगी। यह युवाओं की ही ताकत थी कि विपक्ष को भी झख मारकार उनका साथ देना पड़ा। यह भी दिखा कि कोई पावर सेंटर सेर है तो कोई सवा सेर भी है, जो उस पर भारी पड़ सकता है। इसे यदि जीत माना जाए तो सीजेपी से अधिक नौजवानों की है।
यह कहना फिलहाल सही नहीं होगा कि युवाओं – छात्रों का आक्रोश पूरी तरह शांत हो गया है। सिस्टम के तौर- तरीकों से देश के युवाओं में गहरी नाराजगी है। इसीलिए मैं यह कह रहा हूं कि यह मान लेना कि आग बिल्कुल ठंडी पड़ गई है, जल्दबाजी होगी। फिलहाल सीजेपी की तीनों मांगें मोदी सरकार को मजबूरी में मांगनी पड़ी है। कारण कि यह आंदोलन विदेशों के साथ ही देश के अन्य राज्यों और उनके जिलों में भी पसर रहा था। सीजेपी ने भी स्वीकार किया कि आंदोलन का बढ़ता दायरा उनके हाथ से बेकाबू होता जा रहा है। देर होने पर मोदी सरकार को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती थी। यानी, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि युवाशक्ति की मांगों को मानने के पीछे सिस्टम पर गहराते सियासी संकट का बड़ा हाथ है।
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लेखक, हिन्दुस्तान, पटना (बिहार) के पूर्व राजनीतिक संपादक रहे हैं