भोला नाथ
पटना : बांकीपुर पर जनता का फैसला कल यानी सोमवार 3 अगस्त, 2026 को आ जाएगा। सुबह वोटों की गिनती शुरू होगी और कुछ घंटों बाद दोपहर तक रिजल्ट आ जाएगा…! महज एक उपचुनाव होने के बाद भी आखिर यह विधानसभा क्षेत्र क्यों इतना तवज्जो पा रहा है? पूरे देश की नजरें क्यों इस पर टिकी हैं? आखिर क्या है इसमें खास? आइए एक विहंगम नजर डालते हैं…
सियासी बयानों की बात करें तो भाजपा, जनसुराज और राजद तीनों यहां अपनी-ओनी जीत के दावे कर रहे हैं। मगर, जब तक परिणाम नहीं आ जाता, कुछ भी कहना मुहाल है। सिर्फ दावों से जीत हासिल होती तो फिर वोटिंग कराने का कोई मतलब नहीं होता। इस लिहाज से देखें तो नतीजे को लेकर भाजपा का बहुत कुछ दांव पर लगा है। आखिर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की यह खाली की हुई सीट है। इस विस क्षेत्र को अपना गढ़ मानने वाली भाजपा ने इस बार इस सीट को जीतने की कोशिश में अपना कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस चुनाव में भाजपा का उम्मीदवार बदलना भी काफी सुर्खियों में रहा। …और आनन-फानन नामांकन के अंतिम दिन नीरज कुमार ने पर्चा भरा। नीरज भी उसी समाज से हैं, जिससे भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन हैं। नीरज के प्रचार में भाजपा के सभी दिग्गजों के साथ ही एनडीए के घटक दलों के बड़े नेता भी लगे। खुद पूर्व सीएम नीतीश कुमार ने उनकी जीत की अपील की। इतने प्रयास के बाद भी इस विधानसभा क्षेत्र का वोटिंग परसेंटेज नहीं बढ़ा, बल्कि यह पिछले बार से भी कम ही रहा।
दरअसल, भाजपा की मशक्कत जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर (पीके) की वजस से बढ़ी। नामांकन से पहले से ही पीके ने इस चुनाव को सियासी से अधिक भावनात्मक रंग देना शुरू कर दिया था। राजद ने इस बार भी पिछली बार की उम्मीदवार रेखा गुप्ता पर दांव खेला। मगर, सियासी गलियारों की चर्चा पर गौर करें तो मुख्य मुकाबला नीरज और पीके यानी भाजपा और जनसुराज के बीच ही है। कई भाजपा नेता सुविधा के लिहाज से मुकाबला राजद की रेखा गुप्ता से बता रहे हैं। वैसे, महज कुछ घंटों बाद तमाम कयासों से धुंध छंट जाएगा। गौरतलब है कि चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा और जनसुराज के बीच कई तरह के आरोपों के दौर भी चले। भाजपा की यह भी शिकायत रही कि पीके ने वोटरों को प्रभावित करने के लिए अधिक धनराशि खर्च की। कुल मिलाकर देखें तो इस चुनाव के कारण पीके भी देश के राजनीतिक पटल पर एक बार फिर बहस के केन्द्र में रहे।
यहां यह भी गौर करने लायक है कि बांकीपुर उपचुनाव के लिए मतदान दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेन-जी के अहम प्रोटेस्ट (25 जुलाई) के महज पांच दिन बाद यानी 30 जुलाई को हुआ। वोटिंग से महज तीन दिन पहले शासन का आदेश भी चर्चा में रहा। इसके तहत 26 जुलाई की शाम 6 बजे तक बिहार में नीट पेपर लीक के आंदोलनकारियों पर दर्ज केस वापस लेने और जेलों में बंद प्रोटेस्टरों को रिहा करने की ताकीद थी। इसे नाराज युवाओं खासकर जेन-जी के आक्रोश को ठंडा करने की कोशिश के रूप में देखा गया। इसी तरह भोजपुर में भरत तिवारी मुठभेड़ कांड पर कुछ ऐसे फैसले आए जिनको एक खास समाज की नाराजगी को दूर करने से जोड़ा गया। लोगों का मानना है कि भाजपा अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के सम्मान की खातिर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। हकीकत नहीं, महज कल्पना करके देखिए, अगर नतीजे प्रतिकूल आए तो क्या -क्या और किस तरह देश के सियासी परिदृश्य बदलेंगे। इसके मद्देनजर भाजपा पूरे चुनाव के दौरान काफी चौकन्नी दिखी। यानी, भाजपा 202 से आगे तो बढ़ना चाहती है, पीछे कतई नहीं…!! साथ ही, वह सदन में किसी ऐसे शख्स को देखना गवारा नहीं कर सकती, जो हर वक्त उस पर हमलावर रहे। जनता के फैसले की घड़ी आ गई है। नतीजे सब साफ कर देंगे। फिर भी, आपका क्या मानना है…?