– By Bhola Nath
‘हिन्दुस्तान’ के पूर्व राजनीतिक संपादक
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विशेष स्टोरी : छठवीं किस्त
पटना। माल महाराज का आऽऽ मिर्जा खेले होली…! मतलब पब्लिक का पैसा है तऽ कोई मोहे नहीं है…अनाप-शनाप खर्च करके उड़ा दीजिएगा…!! यह कहना है जनता का… अपना पीएमसीएम कुछ इसी मसल पर चल रहा है…करोड़ों खर्च करके हेलिपैड बना दिए, मगर आज तक एक्को हेलिकॉप्टर नहीं उतरा…काहेऽ कि परमिशन में सिविल एविएशन का पेंच फंस गया…अरे, जब सीएम, गवर्नर को आना ही नहीं था, तो करोड़ों रुपए खर्च करने उनके लिए दो-दो सुपर डीलक्स सुईट काहे बना दिए…!!! जब डाक्टर लोगों को ही कब्जा कराना था तो मरीजों के लिए 65 प्राइवेट और डीलक्स सुईट क्योंऽ बनाए …! करोड़ों का घी गोईठा में सुखा दिए…!! उधर मरीज बेड और कमरे के लिए भटक रहे हैं, यानी, घर वाला बर तले आऽ बर वाला घर तले…!! वाह रे, प्लानिंग और डिजाइन को मंजूरी देने वाले बड़े-बड़े दिमागदार…!! नाम मरीज का आऽ फायदा पहुंच रहा बिल्डिंग बनाने वाले को…!!
पहले फेज के ट्विन टावर की नौवीं मंजिल पर बना है हेलिपैड …
अपने वर्ल्ड क्लास पटना मेडिकल कालेज और हास्पीटल यानी पीएमसीएच में सीरियस मरीजों को तत्काल मेडिकल ट्रीटमेंट मुहैया कराने के लिए हेलिपैड भी बना है। यह पहले फेज के ट्विन टावर की नौवीं मंजिल पर है। बिहार का यह पहला और देश का दूसरा है। कंस्ट्रक्शन क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि भारत में हेलिपैड से युक्त कोई पहली इमारत यदि है तो वह बंगलोर में है। हालांकि तकनीकी कारणों से कोई इसे बनाने का सोचता भी नहीं है। पीएमसीएच से प्रेरणा लेते हुए पटना में भी एक निर्माणाधीन बिल्डिंग में इसके बारे में सोचा गया। इसके लिए बेस भी तैयार हो गया, मगर, बाद में हेलिपैड बनाने का ख्याल इसके प्रोमोटर्स ने छोड़ दिया। इसकी जगह अब वे रूफटॉप हैंगिंग गार्डन बना रहे हैं। जब उनको नौ मंजिले पीएमसीएच में हेलिपैड शुरू करने के बारे आई दिक्कतों की जानकारी मिली तो उन्होंने अपने 16 मंजिले प्रोजेक्ट पर हैलिपैड बनाने से कदम पीछे खींच लिए।
‘गोल्डन आवर’ में इलाज शुरू कराना था मकसद, मगर अफसर आगे की सोचे ही नहीं…
पीएमसीएच में हेलिपैड बनाने के पीछे कांसेप्ट यह था कि राज्य के दरभंगा, भागलपुर और पूर्णिया जैसे उन बड़े शहरों, जहां एयरपोर्ट की सुविधा है, गंभीर मरीज यदि पटना रेफर होते हैं तो उनको एयर एम्बुलेंस से पीएमसीएच की छत पर बने हेलिपैड पर उतारा जाएगा और बिना समय गंवाए, ‘गोल्डन आवर’ (क्रिटिकल मरीजों के मामले में वह अवधि जिसमें इलाज शुरू होने पर उनकी जान बच सकती है) में उनका इलाज शुरू हो सकेगा। इसी तरह तरह यदि किसी मरीज को पीएमसीएच से विशेष इलाज के लिए दिल्ली, मुम्बई, बंगलोर या चेन्नई भेजना हो तो तुरंत यहां से एयर एम्बुलेंस से रवाना कर दिया जाएगा। कांसेप्चुलअली इसमें कोई दिक्कत नहीं थी। मगर, जिन आला अफसरान ने इसकी प्लानिंग और और डिजाइन को मंजूरी दी, उन्होंने आगे इसका इस्तेमाल कैसे हो पाएगा, इसके बारे में कुछ सोचा ही नहीं था।
हेलिपैड से 15 फीसदी तक बढ़ जाती है प्रोजेक्ट की लागत…
रियलिटी सेक्टर में बड़े प्रोजेक्ट पर काम करने वाले एक प्रोमोटर ने बताया कि हेलिपैड बनाने के लिए नींव से ही ठोस प्लानिंग करनी पड़ती है। इसके लिए तैयार होने वाले मेन पिलरों और ऊपर-नीचे के बेस में सबसे अधिक आयरन रॉड और स्टील की मोटी मोटी पत्तियों का इस्तेमाल होता हैं। गिट्टी और सीमेंट भी काफी लगता है। फिर बालू, सेंटिंग और लेबर कॉस्ट अलग से। इस कारण प्रोजेक्ट की लागत कम से 10 से 15 फीसदी बढ़ जाती है।
मंजूरी देने से पहले सिविल एविएशन बारीकी से जांच करता है…
अब एक बार फिर पीएमसीएच पर आते हैं…!! किसी भी तरह की कोई हवाई ट्रैफिक शुरू करने से पहले केन्द्र सरकार के सिविल एविएशन डिपार्टमेंट (नागर विमानन विभाग) से मंजूरी लेनी होती है। सिविल एविएशन इसकी मंजूरी से पहले काफी बारीकी से जांच करता है। बताया जाता है कि शुरू में सिविल एविएशन ने यह शर्त रखी कि इसके लिए पीएमसीएच को एक नोडल अफसर समेत दो-तीन जानकार लोगों को खास तौर से तैनात करना होगा। ये अफसर सिविल एविएशन से कोआर्डिनेशन (समन्वय) में रहेंगे। उनको खास तौर से यह देखना होगा कि जब भी कोई एयर एम्बुलेंस पीएमसीएच के हेलिपैड पर लैंडिंग या वहां से टेकऑफ करे तो उस समय कोई दूसरा हवाई जहाज या हेलिकॉप्टर उसके एयर रूट में नहीं हो। बताया जाता है कि स्वास्थ्य विभाग की हरी झंडी के बाद पीएमसीएच प्रशासन इसके लिए तैयार हो गया।
असली दिक्कत सिविल एविएशन टीम के मौका मुआयना के समय आई…
लेकिन, बताया गया कि असली दिक्कत सिविल एविएशन की टीम द्वारा मौका मुआयना के समय आई। एक दिक्कत ऊंचाई को लेकर भी आई, कि इतनी हाइट (नौवें माले) पर एयर ट्रैफिक कंट्रोल में दिक्कत आएगी। दूसरी परेशानी पीएमसीएच के गंगा के किनारे स्थित होने को लेकर था। सिविल एविएशन टीम का तर्क था कि गंगा के किनारे शवों को जलाया जाता है और चील आदि पक्षी मंडराते रहते हैं। इन हालात में सेफ उड़ान में हमेशा खतरा बना रहेगा। इस तरह सिविल एविएशन के इस पेच से पीएमसीएच से एयर एम्बुलेंस आपरेट करने का ड्रीम ध्वस्त हो गया। लिहाजा, आज तक एक भी मरीज को इसका लाभ नहीं मिला। इस तरह हेलिपैड बनाने में जो करोड़ों रुपए का खर्च आया, उसका लाभ मरीजों को तो नहीं, अलबत्ता निर्माण एजेंसी को जरूर हुआ। हालांकि, इसमें एजेंसी की कोई गलती नहीं दिखती है…!!
र्फैक्ट चेक :
‘वर्ल्ड क्लास पीएमसीएच : हकीकत और फसाना…’ की पांचवीं किस्त में ‘आरएसबी के सर्जरी डिपार्टमेंट में हुआ था नीतीश जी की माताजी का आपरेशन…’ उप शीर्षक के तहत आपने पढ़ा कि नीतीश कुमार जब बिहार के मुख्यमंत्री थे तब उनकी माता जी और वर्तमान स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार की दादी जी का हार्निया का आपरेशन पीएमसीएच के राजेन्द्र सर्जिकल ब्लाक (आरएसबी) के सर्जरी डिपार्टमेंट में डा. आरएन सिंह की यूनिट में हुआ था। वहां यह स्पष्ट करना है कि यह सर्जरी यूनिट डा. आएन सिंह का नहीं, बल्कि, डा. आरपी सिंह का था। साथ ही, तब चंचल कुमार स्वास्थ्य विभाग के हेड नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सचिव हुआ करते थे।