भोला नाथ
बीआरबीजे न्यूज, पटना। पहले इन कुछ नारों पर गौर कीजिए…
अखिलेश तुम मत घबराना ….
देश का नेता कैसा हो…..
अखिलेश भइया जिन्दाबाद…
अखिलेश तुम संघर्ष करो….
जो हमसे टकराएगा….
ऐसे कई नारे शनिवार को पटना एयरपोर्ट पर लग रहे थे। मौका था… कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद डा. अखिलेश प्रसाद सिंह के पटना आने पर उनके शानदार स्वागत का…। एयरपोर्ट पर भारी भीड़ जमा थी। यह अखिलेश समर्थकों की भीड़ थी। इसमें सभी जाति-समाज के लोग शामिल थे। ढोल – नगाड़े बज रहे थे। हाथों में कांग्रेस का झंडा और फूल माला…!! खासबात यह थी कि ये नारे उस अखिलेश सिंह के लिए लग रहे थे, जिनको कांग्रेस आलाकमान ने बिना उनका अध्यक्षीय कार्यकाल पूरा हुए ही अपदस्थ कर दिया है। वह भी ऐसे समय में जब बिहार में कुछ ही माह में विधानसभा का चुनाव होने वाला है। कांग्रेस के इतिहास में यह दुर्लभ मौका था, जब किसी अपदस्थ अध्यक्ष के लिए इतनी बड़ी तादाद में लोग उनका भव्य स्वागत करने आए थे। इस तरह का स्वागत तो नए बने अध्यक्ष राजेश राम का भी नहीं हुआ था। आइए …जानते हैं पटना एयरपोर्ट पर अखिलेश सिंह के इस अभूतपूर्व स्वागत और उनके लिए लग रहे इन नारों के क्या हैं मायने…!!
अखिलेश समर्थकों का शक्ति प्रदर्शन
इन नारों में अखिलेश समर्थकों का वह दर्द भी झलक रहा था, कि पार्टी हित में काम करने वाले एक समर्पित नेता कार्यकर्ता का क्या हश्र कांग्रेस में हुआ। एयरपोर्ट पर जुटी भीड़ अखिलेश समर्थकों का शक्ति प्रदर्शन भी माना जा रहा है। इसके जरिए उन्होंने दो-टूक संदेश दिया कि अखिलेश सिर्फ कांग्रेस के संकट मोचक ही नहीं, बल्कि बिहार में उनका अपना भी दमदार जनाधार है। पार्टी भले ही उनको पदच्यूत कर दे, बिहार में कांग्रेस की सियासत वह अपनी शर्तों पर ही करेंगे। अखिलेश ब्रह्मर्षि समाज से आते हैं और उनको राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का करीबी भी माना जाता है। उनको हटाने के प्रमुख कारणों में सवर्ण जाति और लालू का करीबी होना, ये दोनों भी माने जा रहे हैं।
अध्यक्ष बदलना से कोई फर्क नहीं पड़ेगा
पटना एयरपोर्ट पर स्वागत के बाद मीडिया से मुखातिब डॉ. अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा कि अध्यक्ष बदलना रूटीन काम है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कांग्रेस मजबूत है, आने वाले चुनाव में मजबूती से लड़ेंगे। हमसे ज्यादा अनुभवी और एनर्जेटिक लोगों को कांग्रेस आगे कर रही है। अध्यक्ष बना रही है, प्रभारी बना रही है, इसमें कोई दिक्कत की बात नहीं है। सब लोग मिलकर कांग्रेस के लिए काम करेंगे। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी से अच्छे संबंध हैं। उन्होंने कहा कि राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद से हमारा संबंध वर्षों का है और रहेगा। वे मेरे अभिभावक हैं। उन्होंने हमें विधानसभा का टिकट दिया, लोकसभा का टिकट दिया, मंत्री बनाया। गौरतलब है कि साल 2022 में कांग्रेस ने अखिलेश सिंह को बिहार प्रदेश का अध्यक्ष बनाया था।
अखिलेश का तंज… !!
डा. अखिलेश सिंह का यह बयान कि हमसे ज्यादा अनुभवी और एनर्जेटिक लोगों को कांग्रेस आगे कर रही है, अध्यक्ष बना रही है, प्रभारी बना रही है, इसे आलाकमान पर तंज के रूप में भी देखा जा रहा है। कारण, सभी जानते हैं कि आज की तारीख में कांग्रेस के बिहर प्रभारी कृष्णा अल्लावरू हों या नए बने अध्यक्ष राजेश राम, इन दोनों से अनुभवी नेता अखिलेश हैं। पार्टी के लिए उन्होंने अपनी उपयोगिता भी समय समय पर साबित की है। ऐन बिहार चुनाव से पहले उनके जैसे अनुभवी नेता को हटाने का तर्क किसी के गले नहीं उतर रहा है। आलाकमान के इस फैसले से सभी चकित हैं। वह महागठबंधन में एकमात्र नेता हैं, सीटों के तालमेल के मुद्दे पर राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद से सहजता से बात कर सकते हैं, अपना पक्ष रख सकते हैं।
क्या अखिलेश अलग राह तलाशेंगे ??
शनिवार को पटना एयरपोर्ट शक्ति प्रदर्शन का एक मायने यह भी निकाला जा रहा है कि क्या अखिलेश कांग्रेस के कुछ पूर्व अध्यक्षों की तरह अपने लिए अलग राह तलाशेंगे। अब यह छुपा तथ्य नहीं है कि कांग्रेस में समर्पित नेताओं के लिए बने रहना कितना मुश्किल हो गया है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद जैसे नामचीन नेता इसके उदाहरण हैं। इससे पहले भी शरद पवार और पीए संगमा सरीखे नेताओं को कांग्रेस से हटना पड़ा था। वहीं, बिहार के संदर्भ में देखें तो प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्षों में – चौ. महबूब अली कैसर, अनिल शर्मा, रामजतन सिन्हा, अशोक चौधरी जैसे बड़े नाम सामने हैं। कैसर तो पार्टी बदल सांसद भी बने, वहीं, अशोक चौधरी, जदयू के बड़े नेता हैं और नीतीश सरकार में लम्बे समय से मंत्री हैं। यह वही अशोक चौधरी हैं, जिनके अध्यक्षीय कार्यकाल में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में काफी बेहतर प्रदर्शन किया था। लेकिन, कांग्रेस के दिल्ली के कुछ बड़े नेताओं के रुख से आजीज आकर उन्होंने पार्टी छो़ड़ दी थी। अखिलेश के बारे में वही जानकारी सामने आ रही है। वह भी, कांग्रेस के दिल्ली दरबार के कुछ बड़े नेताओं की आंखों की किरकिरी बने हुए थे। भक्तचरण दास के प्रभारी रहते एक बार पहले भी दलित को कमान सौंपने के नाम पर उनको अध्यक्ष पद से हटाने की बात चली थी, मगर तब उस खेमे की चल नहीं पाई थी। अखिलेश पर कमेटी गठन नहीं करने का भी आरोप लग रहा है, मगर उनके समर्थकों की मानें तो कमेटी की लिस्ट पर छह माह पहले ही आलाकमान को दे चुके थे। इन सब तथ्यों के बरअक्स क्या यह माना जाए कि अखिलेश भी अपने लिए नई राह तलाशेंगे।
लालू के करीबी होने का तर्क
चुनाव से पहले अखिलेश सिंह को अध्यक्ष पद से हटाने के पीछे यह भी तर्क दिया जा रहा है कि वह लालू प्रसाद यादव के बेहद करीबी हैं। लालू यादव की पार्टी में लंबे समय तक रह भी चुके हैं। लालू प्रसाद यादव की मदद से ही अखिलेश सिंह राज्यसभा भेजे गए थे। दिल्ली में कांग्रेस के अंदर एक गुट का यह मानना था कि पार्टी को लालू प्रसाद यादव के साये से बाहर निकलना चाहिए और उनको अखिलेश सिंह के रहते हुए यह संभव नहीं लग रहा था। ऐसे में यह चर्चा भी है कि क्या अखिलेश को लालू का करीबी होने की कीमत प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी गंवाकर चुकानी पड़ी।
कन्हैया कुमार की बिहार की सियासत में सक्रियता
कांग्रेस बिहार की राजनीति में कन्हैया कुमार की सक्रिय एंट्री चाहती थी और इसकी कवायद लंबे समय से चल रही थी। अखिलेश सिंह के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था। कन्हैया और अखिलेश सिंह दोनों बिहार से और एक ही जाति के हैं। उधर, राजद नेता तेजस्वी यादव भी कन्हैया कुमार की पसंद में शुमार नहीं हैं। अखिलेश को कुर्सी गंवाने की हक वजह यह भी मानी जा रही है। सवाल यह भी है कि क्या कन्हैया कुमार से अखिलेश सिंह की दूरी उनपर भारी पड़ गई। क्या कांग्रेस का यह मानना है कि अखिलेश सिंह के मुकाबले कन्हैया कुमार भूमिहार में ज्यादा प्रभावी होंगे। वैसे कन्हैया कुमार दिल्ली से बैटिंग करते हैं। ऐसे में लगता है कि दिल्ली वालों ने उनपर ज्यादा भरोसा जताया है।
पप्पू यादव का फैक्टर
पप्पू यादव भी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के करीबी बने हुए हैं। पप्पू यादव की भी सक्रिय एंट्री अखिलेश सिंह के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए नहीं हो रही थी। दूसरे राज्यों में तो पप्पू यादव कांग्रेस के लिए बैटिंग कर रहे थे, लेकिन बिहार में पप्पू यादव को लेकर अखिलेश सिंह सकारात्मक नहीं थे। अखिलेश सिंह के जाने के बाद पप्पू यादव की सक्रिय भागीदारी भी कांग्रेस पार्टी के राजनीति में देखने को मिल सकती है।
दलित, अति पिछड़ा व पिछड़ा वोट पर नजर
बिहार में विधानसभा चुनाव को लेकर राहुल गांधी एक्टिव हैं। वह दो बार बिहार आ चुके हैं। माना जा रहा है कि कांग्रेस की नजर दलित, अति पिछड़ा और पिछड़ा वोट बैंक पर है। कांग्रेस इस 55 फीसदी वोट बैंक को साधना चाहती है। राजेश राम दलित महादलित रविदास समाज से आते हैं। महादलितों में इसकी अच्छी संख्या है। संभवत: राजेश राम के जरिए कांग्रेस इसे साधने की तैयारी में है। देखना है कि कांग्रेस को सवर्ण को हटाकर दलित को अध्यक्ष बनाने का यह दांव बिहार में कितना सफल हो पाता है।